जन्माष्टमी पर दही हांडी क्यों फोड़ते हैं? पढ़िये अद्भुत रहस्य

जन्माष्टमी का त्यौहार पूरे देश में धूमधाम के साथ मनाया जाता है। जन्माष्टमी के मौके पर दही हांडी उत्सव भी मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार, भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जन्माष्टमी मनाई जाती है। भगवान के जन्म की खुशियां मनाने के लिए दही हांडी का आयोजन किया जाता है।

दही हांडी पर्व क्यों मनाते हैं ?  


बाल गोपाल के जन्म के उपलक्ष्य पर दही हांडी का पर्व बहुत धूम धाम से मनाया जाता है । कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण बचपन में दही, दूध, मक्खन आदि बहुत शौक़ से खाते थे ।  

भगवान कृष्ण से बचाने के लिए उनकी माता यशोदा अक्सर दही हांडी को किसी ऊँचे स्थान पर रखती थीं, किन्तु बाल गोपाल वहाँ तक भी पहुंचने में सफ़ल हो जाते थे । इसके लिये उनके दोस्त उनकी मदद करते थे । इसी घटना की याद में सभी कृष्ण भक्त अपने दही हांडी का पर्व मनाते हैं ।  

भगवान को पसंद था दही और माखन


भगवान कृष्ण को दही और मक्खन (माखन) बेहद पसंद था। वह अक्सर गोपियों की मटकियों से मक्खन चुराकर खाया करते थे। गोपियां कृष्ण से परेशान होकर उनकी शिकायत मां यशोदा से करने आती थीं। माता यशोदा के समझाने का भी बाल गोपाल पर कोई असर नहीं होता था।  

जन्माष्टमी पर दही हांडी क्यों फोड़ते हैं? Dahi Handi is broken on Janmashtami



गोपियां अपने दही को श्रीकृष्ण से बचाने के लिए मटकी को ऊंचाई पर टांग देती थीं। लेकिन कान्हा अपनी चतुराई से चढ़कर मटकी से दही या माखन चुरा लेते थे। कृष्ण को उनकी माखन लीलाओं के कारण माखन चोर के नाम से पुकारा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की इन्हीं लीलाओं को याद करने के लिए हर साल जन्माष्टमी पर दही हांडी उत्सव मनाया जाता है।  

दही हांडी कैसे मनाते हैं  


दही हांडी मनाने की प्रक्रिया काफ़ी दिलचस्प होती है । श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दुसरे दिन इस पर्व का आयोजन किया जाता है । इस दिन मिट्टी की हांडी में दही, मक्खन, मिठाई, फल आदि भर के एक बहुत ऊंचे स्थान पर टांग दिया जाता है । इसके बाद इसे तोड़ने के लिए विभिन्न युवाओं का दल भाग लेता है ।   

ये सभी दल एक के बाद एक इसे तोड़ने का प्रयास करते हैं । दही हांडी तोड़ने के लिए विभिन्न दल के लोग एक दुसरे के पीठ पर चढ़ कर पिरामिड बनाते हैं । इस पिरामिड के सबसे ऊपर सिर्फ एक ही व्यक्ति चढ़ता है और हांडी तोड़कर पर्व को सफ़ल बनाता है । हांडी तोड़ने वाले दल को कई तरह के उपहारों से नवाज़ा जाता है ।  

अर्धरात्रि में चंद्रमा का उदय  


श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में कृष्ण जन्म का उल्लेख मिलता है। इसमें कहा गया है कि जिस समय पृथ्वी पर अर्धरात्रि में कृष्ण अवतरित हुए ब्रज में उस समय पर घनघोर बादल छाए थे। आज भी कृष्ण जन्म के समय अर्धरात्रि में चंद्रमा उदय होता है। उस समय धर्मग्रंथ में अर्धरात्रि का जिक्र है।  


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