भोजन करने के पांच नियम


सनातन धर्म ग्रंथों में धर्म के साथ-साथ मानव कल्याण के लिए भी बहुत से नियम दिए गए हैं। जिनका यदि सही प्रकार से पालन किया जाए तो ये मानव जीवन के लिए बहुत ज्यादा उपयोगी हो सकते हैं। सनातन धर्म के विभिन्न ग्रंथों में एक महाभारत एक बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रंथ है। जिसके अंतर्गत भगवान श्री कृष्ण की विभिन्न लीलाओं के साथ एक युग से दूसरे युग परिवर्तन का निरूपण है।
महाभारत में पितामह भीष्म ने अर्जुन को भोजन के कुछ नियम बताए हैं। जो कि मानव कल्याण के लिए उपयोगी हैं। 
यहाँ आपको हम उन्हीं में से 5 नियमों को बता रहे हैं। जिन्हें अपनाकर आप परिवार में हो रही परेशानी से बच सकते हैं।

प्रथम प्रकार का भोजन

जिस भोजन में बाल निकल आये ऐसे भोजन को कभी नहीं करना चाहिए इस तरह के भोजन को करने से मनुष्य कंगाल हो जाता है। थाली में यदि बाल हो तो भी उस भोजन को नहीं कारना चाहिए।

द्वितीय प्रकार का भोजन

महाभारत के अनुसार यदि आपके भोजन की थाली में लात लग गई हो या किसी का पैर छू गया हो तो इस प्रकार का भोजन करने से परिवार में दरिद्रता आती है। पैर से ठोकर लगा हुआ भोजन कभी नहीं करना चाहिए।

तृतीय प्रकार का भोजन

भोजन को यदि कोई लांघ के गया हो तो ऐसे भोजन को कदापि नहीं करना चाहिए। इस तरह के भोजन को करने से घर मे हमेसा क्लेश रहता है। ऐसा भोजन नाली में पड़े कीचड़ के समान होता है। इस तरह का भोजन स्वयं न करके किसी पशु-पक्षी को डाल देना चाहिए।

चौथे प्रकार का भोजन

घर मे बेटी होना घर को सौभाग्यशाली बनाता है। बेटी स्वयं लक्ष्मी का रूप होती है। महाभारत में बताया है यदि बेटी कुंवारी है और पिता के साथ बेटी भोजन करती है तो ऐसे पिता की कभी भी अल्पमृत्यु नहीं होती बेटी अपने पिता की मृत्यु को हर लेती है। भोजन करते समय भोजन का कुछ भाग अपनी बेटी को अवश्य खिलाएं।

पांचवें प्रकार का भोजन

पत्नी अर्धांगनी होती है। और पत्नी का सम्मान करना पति का कर्तव्य होता है। पितामह भीष्म बताते हैं यदि पति और पत्नी एक साथ एक थाली में भोजन करते हैं। तो उनके बीच प्रेम बढ़ता है और यह भोजन चारों धामों के पुण्य का फल प्रदान करता है। जब पति और पत्नी एक साथ भोजन कर रहे होते हैं तो उनका प्रेम मद के रूप में भोजन में आ जाता है। उस समय थाली से किसी दूसरे को भोजन नहीं लेना चाहिए क्योंकि वह भोजन दूसरे के लिए नुकसानदेह हो सकता है।

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