प्राणनाथ जयंती पर जानिए कौन थे महामति प्राणनाथ ?

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कौन थे महामति प्राणनाथ ?

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प्राणनाथ जयंती -

लेख - स्वामी श्री परमानन्द जी महाराज ( लेखक योग एवं भागवताचार्य हैं )

सनातन हिंदू धर्म के रक्षक निष्कलंक बिजया अभिनंदन बुद्धावतार महामती प्राणनाथ जी के प्राकट्योउत्सव पर विशेष पूरा पढ़ें और शेयर करें।

पृथ्वी पर आदिकाल से सत्य असत्य न्याय अन्याय धर्म अधर्म के मध्य युद्ध होता रहा पृथ्वी पर प्रकृति प्रदत्त कोई ना कोई महापुरुष प्रकट होता रहा उन महापुरुषों में बहुत से अवतार श्रेणी में भी माने जाते जिन्होंने मानव जीवन  उत्थान लिए अपने ज्ञान अनुसार सत्य के मार्ग पर चलने को निर्देशित करते रहे और करते रहेंगे।

    उनमें बहुत से ऋषि मुनि भी हैं जिनके अंदर यह प्रश्न उठते रहे - 

  • 1. मैं कौन हूं
  • 2. मैं कहां से आया हूं
  • 3. मैं क्यों आया हूं 
  • 4. मेरे जन्म और मरण का मुख्य कारण क्या है 
  • 5. मरने अर्थात शरीर छोड़ने के पश्चात कहां जाऊंगा

इन पांच प्रश्नों का हल करने के लिए संसार में मानव अनेकों  धर्मों  विभक्त होकर अनेक प्रकार से उनकी मान्यताओं के अनुसार अनेकों अलग-अलग रास्ते बताए गए परंतु विश्व के सर्वोच्च प्राकृतिक सनातन धर्म में भी ऋषि-मुनियों ने इन प्रश्नों का हल करने के लिए  तप उपासना समाधि आदि के द्वारा अपने आत्मस्वरूप और परमात्मा को खोजा परंतु  परमात्मा के स्वरूप को  वे प्राप्त नहीं कर सके ।

यथा 

प्रजापतिपतिः साक्षाद्भगवान् गिरिशो मनु।

दक्षादयाः प्रजाध्यक्षा नैष्ठिकाः सनकादयाः ।।

मरीचिरत्र्यड्ंगिरसौ पुलस्त्यः  पुलह  क्रतुः।

भ्रुगुर्वशिष्ठ।   इत्येते   मदन्ता।   ब्रह्मवादिनः।।

अद्यापि वाचस्पतयस्तपोविद्यासमाधिभिः ।

पश्यंतोअपि न  पश्यन्ति पश्यन्तिं परमेश्वरम् ।।

शब्दब्रह्मणि   दुष्पारे    चरन्त     उरुविस्तरे।

मन्त्रलिङ्गैर्व्यवच्छिन्नं भजन्तो न विदुः परम् ।।

      भा ,अ, 29 श्लोक 42 43 44 45

भावार्थ - साक्षात् प्रजापतियोंके पति ब्रह्माजी , भगवान् शंकर , स्वायम्भुव मनु , दक्षादि प्रजापतिगण , सनकादि नैष्ठिक ब्रह्मचारी , मरीचि , अत्रि , अंगिरा , पुलस्त्य , पुलह , क्रतु , भृगु , वसिष्ठ और मैं - ये जितने ब्रह्मवादी मुनिगण हैं , समस्त वाङ्मयके अधिपति होनेपर भी तप , उपासना और समाधिके द्वारा दूंढ - ढूँढ़कर हार गये , फिर भी उस सर्व साक्षी परमेश्वर को आज-तक न देख सके ॥ ४२-४४ ॥ वेदभी अत्यन्त विस्तृत हैं , उसका पार पाना हंसी - खेल नहीं है । अनेकों महानुभाव उसकी आलोचना करके मन्त्रोंमें बताये हुए वज्र- हस्तत्वादि गुणोंसे युक्त इन्द्रादि देवताओंके रूपमें , भिन्न - भिन्न कर्मोके द्वारा , यद्यपि उस परमात्माका ही भजन करते हैं तथापि उसके स्वरूप को वेभी नहीं-जानते ॥ ४५ ॥



श्रीमद्भागवत के  इन  श्लोकों से सिध्द होता है कि जो 24 अवतार हुए हैं वह सभी सतोगुण भगवान विष्णु के हैं ना कि परमात्मा के क्योंकि उपर्युक्त भगवान शिव ब्रह्मा सहित जितने भीअन्य ऋषि मुनि हैं सभी भगवान विष्णु के अवतारों के सानिध्य सन्निकट रहे इसीलिए भागवत रचना करते समय सत्यवती नंदन कृष्ण द्वैपायन व्यास जी को यह परम सत्य लिखना पड़ा कि परमात्मा के स्वरूप को वेदों सहित अन्य  कोई भी नहीं देख सका द्वापर के अंत में भगवान वैकुंठनाथ मथुरा में कारागार में देवकी के गर्भ से प्रकट होने के पश्चात गोलोकी नाथ कृष्ण के कलेवर में विलीन हो गये नंद के यहां साक्षात परमात्मा आवेष स्वरूप प्रकट हो गए।

11 वर्ष 52 दिन तक बृज और रास की लीला कर आवेष पुनः ब्रह्म आत्माओं सहित परमधाम चला गया गोलोक नाथ कृष्ण ने 7 दिन गोपलभेष धर गौयें चराई। और 4 दिन मथुरा में कंस बध कर संस्कार किया यमुना में स्नान कर नन्द बाबा को वस्त्र आदि उतार कर दिये इन्हीं गोलोक नाथ के तेज में भगवान बैकुंठ नाथ विष्णु विलीन थे वे  अब प्रकट हो गये  जिनको ब्रज में रहने का अधिकार नहीं उन्होंने द्वारिका में बास किया।

महाभारत युद्ध में गीता का उपदेश आदि संपूर्ण अवतार के कार्य करके यदुवंश मे अवत्रीण देवताओं के रूप यदुवंशियों का संहारकर पुनः बैकुंठ धाम चले गये इस प्रकार श्री कृष्ण की यह त्रिधालीला महामति प्राणनाथ जी के अतिरिक्त आज दिन तक भी नहीं समझा सका द्वारकाधीश के बैकुंठधाम पधारने के  पश्चात उसी समय कलयुग प्रारंभ हो गया।

पुराणों के अनुसार कलयुग में विशेष कर दो अवतार बताए गये हैं - 

उनमें प्रथम शाक्य वंश में महाराज शुद्धोधन नरेश के पुत्र रूप में भगवान गौतम बुद्ध सत्य अहिंसा के उपदेशक बौद्ध धर्म के संस्थापक हुए दूसरा अवतार निष्कलंक विजयाभिनंदन महामति प्राणनाथ जी

वह जो इस प्रकार है - कलयुग में लगभग 3000 वर्ष बीतने के पश्चात लगभग सभी अवतार हो चुके हैं इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि कलयुग का अंतिम चरण चल रहा है।

यथा

युधिष्ठिरोविक्रमश्चतथावैशालिवाहनः।

विजयाभिनन्दनश्चैवतथानागार्जुनोनृपः।।

तथाकल्किश्च भगवानतेवैशकवंधिनः ।

करिष्यंतिकलौभूपाधर्मस्थापनमेवच् ।।

वामनश्चविधिःशेषःसनकोविष्णुवाक्यतः।

धर्मार्थहेतवेचैतेभविष्यंति द्विजाःकलौ ।।

विष्णुस्वामीवामनांस्तथा माध्वस्तुब्रह्मणा ।

रामानुजस्तुशेषांशोर्निबार्कःसनकस्यच ।।

एतेकलौयुगेभाव्याःसंप्रदायप्रवर्त्तकाः ।

सवत्सरेविक्रमस्यचत्वारःक्षितपावनः ।।

गर्ग, सं, अश्व, ख ,अ  61 श्लोक 20, 21, 23 24

युधिष्ठिर ,विक्रम ,और शालीवाहन , नागार्जुन, कल्कविजयाभिनंदन, यह कलयुग में धर्म की स्थापना करेंगे और बामन, ब्रह्मा, शेष और सनकादि विष्णु वचन के अनुसार कलयुग में धर्म की स्थापना के लिए द्विजरूप में प्रकट होगें।

भगवान बामन के अंश से विष्णुस्वामी, ब्रह्मा के अंश से माधवाचार्य जी,शेष के अंश से रामानुजाचार्य, सनतकुमार के अंश से निंबार्काचार्य ,यह चारों कलयुग के संप्रदाय के प्रवर्तक होंगे और यह विक्रम संवत सर के प्रारंभिक काल में ही होंगे और इन सभी के अवतार हो चुके हैं इस प्रकार हैं -


  • 1. भगवान बामन के अंश विष्णु स्वामी का जन्म विक्रम संवत से लगभग 40 वर्ष पहले हुआ
  • 2. ब्रह्मा जी के अंश से माधवाचार्य का जन्म विक्रम संवत 1254 में तदनुसार 11 97 ईसवी में हुआ
  • 3. सनकादि के अंश से श्री निंबार्क आचार्य जी का जन्म विक्रम संवत 1219 तदनुसार सन 1162 ईसवी में          हुआ
  • 4, शेषनाग के अंश से  श्री रामानुजाचार्य का जन्म विक्रम संवत 10 73 सन् तदनुसार1016 ईसवी में हुआ
  • 5 .निष्कलंक विजयाअभिनंदन का आविर्भाव अर्थात जन्म विक्रम संवत 1675 में  हुआ इन्हीं को महामति          प्राणनाथ जी कहते हैं

यथा-

महीतले च मलेच्छानां राज्यसंवराः प्रवर्तते।

परस्परं    विरोधे  च     औरंगाख्योभवेद्यद।।

विक्रमस्य गतेअब्धे सप्तदशाष्ट त्रिंकयदा  ।

तदाय।      सच्चिदानन्दोअक्षरात्परतः  परः ।।

भारते चेन्दरायां सः बुद्धः आविर्भावष्यति।

सः बुद्धः कल्करूपेण क्षात्र धर्मेण तत्परः ।।

चित्रकूटे वनेरम्ये सः वैतत्र।   भविष्याति।

वर्णाश्चमाणां धर्मस्य स्थापंन वै करिष्यति ।।

            भविष्योउत्तर पुराण उत्तरखंड

भावार्थ जब पृथ्वी पर मुसलमानों और सनातन हिंदू राजाओं में परस्पर विरोध होगा उस समय औरंगजेब नाम का बादशाह का भारतवर्ष में राज्य होगा विक्रम संवत 1738  होगा उस समय अक्षरातीत परमात्मा की शक्ति श्री इंद्रावती के बुद्धनिष्कलं के रूप में अवतरित होगी उस समय भी निष्कलंकबुद्ध क्षत्रिय धर्म से युक्त होकर चित्रकूट के वन मे रमते हुए  प्रकट होंगे और वर्णाश्रम धर्म की स्थापना करते हुए धर्म की रक्षा करेंगे।

      धाम धनी महामति श्री प्राणनाथ जी का पृथ्वी पर आविर्भाव विक्रम संवत 1675 अश्विन कृष्णा चौदस को दिनां 26 अक्टूबर सन 1618 ईसवी में रविवार के दिन जामनगर संभल में पिता श्री केशव राय ठाकुर माता धनवाई  के घर हुआ । श्री केशव राय ठाकुर का ज्योतिष के अनुसार बर्ण विप्र बनता है जो की भागवत के अनुसार संभल ग्राम में ब्राह्मण के यहां कल्क अवतार होगा वह कोई और नहीं महामति प्राणनाथ जी हैं उससमय प्रकृति की छटा अनुपम थी  मानो पंचमहाभूत सहित चराचर प्राणी मात्र का मोक्षदाता  पृथ्वी को पावन करते हुए  प्रकट हो गये हों।

     अर्थात  यही निष्कलं विजयाभिनंदन बुद्धावतार महामति प्राणनाथ जी चित्रकूट  प्रदेश में रमते  हुए पन्ना प्रदेश में प्रकट हुए और विश्व ब्रह्मांड  में त्रिविद सृष्टि के कल्याण हेतु सर्वोच्च मोक्ष धाम श्री 5 पद्मावती पुरी धाम की स्थापना की भारतवर्ष में सनातन हिंदू राजाओं को धर्म के प्रति जागृत करते हुए वीर बुंदेला पिता  श्री चंपतराय मां सारंधा नन्दन नर हिन्द केसरी  श्री महाराज छत्रसाल जी को विजयदशमी के दिन जलतरंग नाम की तलवार भेंट कर धर्मांध बादशाहा औरंगजेब का  दमन कर सनातन धर्म की रक्षा लिए आदेश दिया। सनातन हिंदू धर्म की रक्षा का भार महाराजाधिराज छत्रसाल जी के कंधों पर आपने दिया और यह वर दिया।

 छत्ता    तेरे    राज में   धक-धक  धरती होय।

जित जित घोड़ा मुख करे तित तित फत्तेहोय।।

महामति प्राणनाथ जी ने आध्यात्मिक तत्व का वर्णन करते हुए सभी धर्मों का समन्वय किया विश्व में ऐसा कोई धर्म नहीं है जिसका आपने संक्षेप में सरल वर्णन ना कर दिया भूले भटके सभी लोगों को सरल मोक्ष का मार्ग परमपूज्य स्वसंम् वेद श्री तारतम सागर में दर्शाया।

सब सयानो की एकमत पाई ,अज्ञानी देखे रे जुदाई।।

उस समय मानव मानव से घृणा करता था ऊंच-नीच का भेदभाव चर्मपर था खत्म कर आपने सनातन हिंदूधर्म मैं फूट का मुख्य कारण वर्ण  व्यवस्था जाति पांत का भेदभाव दूर कर 

सब जाते मिल होंए एक ठोर ,कोई ना कहे धनी मेरा और  ।। 

का नारा दिया और एक नए सुंदर साथ के रूप में लोगों को संगठित किया।

अरब के लुटेरे शासक भारतवासियों को बंदरगाह से बंदी बना ले जाते थे बहुत सी स्वर्ण मुद्राएं लेकर तब कहीं भारतवासियों को वापस भारत भेजते थे महामती प्राणनाथ जी ने विक्रम संवत 1703 में अरब जाकर जाकर वहां के बादसाह को समझाया कि खुदा के नाम पर ये गुनाह न करो बादशाह को अर्शअजीम का सच्चा संदेश दे भारतवर्ष के समुद्र तटीय लोगो को इस संकट से सदैव के लिये  मुक्त किया

महामति प्राणनाथ जी के द्वारा सनातन हिंदू धर्म की रक्षा लिए भारतवर्ष की सनातन हिंदू राजाओं को ललकारा -

राजाने मलोरे राणें राय तणो ,

धर्म  जातां  रे कोई      दौडो .।

जागोने जोधा रे उठ खडे रहो,

नींद     निगोडी   रे    छोडो ।।

छूटत है रे खडग छत्रियों  से,

धरम    जात      हिंदुआन ।।

 तारतम सागर  कि, प्रक, 58 चौ 1 , 2

उस समय भारत वर्ष में धर्मांध औरंगजेब का अत्याचार चर्मपर था भारतवर्ष की सनातन धर्म की प्रजा त्राहि-त्राहि कर रही थी । भारतीय इतिहास साक्षी है एक-एक दिन में 10,000 सतनामिओं सिर कटवा दिए हिंदुओं को यदि इस्लाम कबूल नहीं करता तो मुस्लिम बना देता था। सनातन धर्म की कुंवारी ललनाओं को पकड़ मुस्लिमों के साथ निकाह करवा देता था। हिंदू मंदिरों को तोड़कर उनकी देव प्रतिमाओं  को हाथी के पैर से घसीट कर मस्जिद की सीडी में लगवाता था ।

भयंकर संघर्ष कर गुरु अर्जुन देव दिल्ली में शहीद हो गए सिखों के 9 गुरु तेग बहादुर जी ने देखा कि हिंदुओं के मंदिरों को तोड़ा जा रहा है। और उनकी मूर्तियों को मस्जिद की सीढ़ियों में लगाया जा रहा है। उन्होंने हिंदुओं को संगठित कर भयंकर युद्ध छेड़ दिया परंतु धोखे से औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर को दरबार में बुलाया और उनसे इस्लाम धर्म स्वीकार करने को कहा गुरु ने अपना सिर देना स्वीकार किया परंतु इस्लाम धर्म स्वीकार नहीं किया । इस बात गुरु तेग बहादुर की सन 1675 ईसवी में उनकी वही हत्या अर्थात वीरगति को प्राप्त हो गए। गुरु तेग बहादुर की हत्या के पश्चात पुर गोविन्द सिंह ने गुरु तेग बहादुर की हत्या का बदला लेने के लिए औरंगजेब से विद्रोह छेड़ दिया । 

भयंकर युद्ध में गुरु गोविंद सिंह के 2 पुत्र वीरगति को प्राप्त हुए और दो पुत्रों को जीवित दीवाल में चुनवाया  जा रहा था छोटे भाई को देख बड़े भाई के नेत्रों में आंसू आ गए छोटे पुत्र ने अपने बड़े भाई से कहा भैया नेत्रों में आंसू क्यों उस समय गुरु गोविंद सिंह के बड़े पुत्र ने अपार दुखद ह्रदय से कहा मेरे छोटे भाई तुम मेरे बाद  में जन्मा था और आज पहले जा रहा है। सुंदर साथ जी भारतीय इतिहास मैं अमर शहीदों की या व्यथा पढ सुनकर ह्रदय फफक फफक रो पड़ता दोनों भारत माता सनातन धर्म की जय बोलते हुए दीवार में चुनवा दिए गए अंत में एक पठान ने गुरु गोविंद सिंह को भी सन 1708 ईसवी धोखे से हत्या कर दी।

अर्थात गुरु गोविंद सिंह जी शहीद हो गए गुरु गोविंद सिंह के बाद सिखों का नेतृत्व बंदा बैरागी के हाथ में आया बंदा बैरागी को गुरु दास के किले में घेरकर लोहे के पिंजरे में बंद कर दिल्ली लाया गया। और उन्हीं के सामने उनके पुत्र की आंखों को निकाल लिया गया और बंदा बैरागी के मुंह में मारा गया इतने पर भी बंदा बैरागी का धैर्य नहीं टूटा बंदा बैरागी के  शरीर से गर्म लोहे के चिमटे से मांस नोचाया गया । बंदा बैरागी जोर-जोर से सनातन धर्म की जय बोलते हुए उत्तर दिया कि जो अपने आत्मस्वरूप में लीन हो जाता। उसे शरीर से मोह नहीं रहता सनातन धर्म की जय बोलते हुए बंदा बैरागी सदैव के लिए अमर हो गए ।

औरंगजेब ने दो-दो हजार सतनामिओं का बध एक ही दिन में करवा दिया करता था भारतीय इतिहास पुराणों में औरंगजेब जितना अत्याचार आज तक किसी भी आसुरी शक्ति ने नहीं किया महाराज शिवाजी अपनें गुरुदेव समर्थ गुरु रामदास की कृपा से महाराष्ट्र को औरंगजेब से स्वतंत्र करा लिया समर्थ गुरु रामदास की एक प्रसिद्ध पुस्तक हिंदी दासबोध के अनुसार हनूमान के अवतार थे।

    औरंगजेब को यह विदित हो गया था कि बुंदेला छत्रसाल के साथ कोई दिव्य महापुरुष है इसलिए बराबर अनेकों बार हमारी सेना  पराजित हो रही है। और बुंदेला छत्रसाल बिजयी हो रहा है । औरंगजेब ने अनेको बार महाराजा छत्रसाल पर आक्रमण किए परंतु प्रत्येक में परास्त हुआ  क्योंकि  बुंदेला महाराज छत्रसाल जी के साथ निष्कलंक विजयाभिनंदन बुद्धावतार महामती प्राणनाथ जी धामधनी का वरदहस्त शुभ आशीर्वाद और असीमकृपा से औरंगजेब का दमन हो गया। और औरंगजेब के अंत समय में पश्चाताप हुआ कि कुरान के अनुसार अपने इमाम मेहदी को मैं पहचान नहीं सका क्योंकि वह तो सनातन हिंदू धर्म में प्रकट हुए थे जो कि मुस्लिमों के लिए उनके मुंह पर पर्दा था पुराण, कुरान ,बाइबल , सभी धार्मिक ग्रंथोंमें कलयुग के अंत में अवतार होने की भविष्यवाणियां भरी पड़ी हैं जो कि महामति प्राणनाथ जी ने अपना निष्कलंक अवतार सिद्ध किया और भारत से बर्बरता पूर्ण इस्लामहुकूमत का सदैव के लिए अन्त हुआ

नर हिंद केसरी महाराज छत्रसाल जूदेव को परम पावन भूमि पन्ना में सिंहासन पर बैठा कर महाराज की उपाधि से घोषित किया।

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